Monday, 3 July 2023

मनोदशा

अब और जीने का मन नहीं करता

अब और पीने का मन नहीं करता


अब और हसने को दिल नहीं करता

अब और रोने से दिल है डरता


कितने आँसू खुद पछ लिये

ये सवाल है मैं खुद से बार-बार करता हूं


कौन आएगा मेरे जनाज़े मुझे

भला कौन है ऐसे मरता


किसी खामोश से शहर के, सुनसान सी गली में

खुद को मैं तलाश करता हूं


अब किसी की कमी नहीं है मुझे

और सबसे  यहीं कहता है


बस यही बात मैं खुद से बार-बार करता हूं

अब और जीने को मन नहीं करता -2



जब दिल है मेरा बहुत भरता

तब जा के कहीं से एक आंसू है बहता


अब और जीने को मन नहीं करता -2